‘दरबार मूव प्रथा’ को बहाल करने के पीछे जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला भले ही अपना चुनावी वादा निभाने की दुहाई दें लेकिन ये फ़ैसला है तो निहायत वाहियात, दुर्भाग्यपूर्ण और निन्दनीय। दुःखद ये भी है कि रजवाड़ों का प्रिवी पर्स ख़त्म करने वाली काँग्रेस ने और सर्वहारा की बातें करने वाले कम्युनिस्टों ने भी उमर सरकार के फ़ैसले का मौन समर्थन ही किया।
सबसे आश्चर्यजनक है – अनुच्छेद 370 को ख़त्म करके राज्य को दो फाड़ करने वाले मोदी-शाह का भी इस बेहूदा फ़ैसले से नज़रें फेर लेना। उनको सोनल वांगचुक पर ग़ैर-वाज़िब NSA लगाना तो ज़रूरी लगा, लेकिन ‘दरबार मूव’ वाली कुप्रथा की वापसी उन्हें अटपटी नहीं लगी। वो अपने सही काम पर डटे क्यों नहीं रहे?
सरकारी घूस जैसा उमर का वादा
‘दरबार मूव प्रथा’ की बहाली का उमर अब्दुल्ला का चुनावी वादा भी उतना ही भ्रष्ट था जितना बिहार में 10-10 हज़ार रुपये सरकारी घूस देने का फ़ैसला है। दोनों समान भर्त्सना के हक़दार हैं। ‘दरबार मूव प्रथा’ को जब 1872 में डोगरा शासक ग़ुलाब सिंह ने शुरू किया तब सर्दियों में श्रीनगर बाक़ी दुनिया से कट जाता था।
वो बैलगाड़ी वाला ज़माना था। सड़कें थीं नहीं, जवाहर टनल थी नहीं, बस-ट्रक और बिजली-फ़ोन-इंटरनेट वग़ैरह कुछ भी नहीं था। उस दौर में ‘दरबार मूव प्रथा’ भले ही तर्कसंगत रही हो, 2020 तक उसे ढोते रहने के पीछे भी चाहे जो सियासी मज़बूरी हो, लेकिन अब 2025 के ‘नये भारत’ में उस विरासत का कुछ भी गौरवशाली शेष नहीं है, सिवाय धन-श्रम की बर्बादी के।
‘दरबार मूव प्रथा’ को ढोने, 10 हज़ार सरकारी कर्मचारियों को उनके घर, दफ़्तर, स्कूल-कॉलेज आदि के साथ श्रीनगर से जम्मू और जम्मू से श्रीनगर लाने-ले जाने का ख़र्चा अभी सालाना 200 करोड़ रुपये से ऊपर है। टैक्स-पेयर के इन रुपयों की बर्बादी हर क़ीमत पर रुकनी चाहिए थी। सत्ताधीश कब समझेंगे कि हर प्रथा ख़ास दौर में शुरू होती है। दौर बदले तो प्रथा भी बदलनी चाहिए। प्रथा, बोझ बन जाए तो उसे मिटा देना चाहिए।
लकीर का फ़कीर बनने का फ़ैसला
आज सर्दियों में भी लाखों लोग श्रीनगर में रहते हैं, लाखों सैलानी भी वहाँ पहुँचते हैं तो फिर अब लकीर का फ़कीर बनने का फ़ैसला निहायत मूर्खतापूर्ण है। माना कि ‘आस्था-प्रधान’ देश में कुछेक हज़ार लोगों के स्वार्थ और ज़ज़्बात ‘दरबार मूव प्रथा’ से जुड़े होंगे। उन्हें ही तो पटाने के लिए उमर अब्दुल्ला ने चुनावी वादा किया था। लेकिन क्या राजनेता हर वादा निभाने के लिए करते हैं? कौन नहीं जानता कि तमाम सियासी वादे सिर्फ़ वोट बटोरने के लिए होते हैं। हर पार्टी करती है।
जनता के पास चुनाव घोषणापत्र के विभिन्न वादों पर अलग-अलग राय ज़ाहिर करने का कोई मौक़ा नहीं होता। इसलिए ये कैसे माने कि उमर अब्दुल्ला का जनादेश सिर्फ़ ‘दरबार मूव प्रथा’ को बहाल करने के लिए था। वादा तो ‘370’ की बहाली का भी है जबकि जो उनके बूते का ही नहीं है।
तो क्या इसे नहीं निभा पाने के लिए वो इस्तीफ़ा देंगे? उनका सूबा टूट कर दो केन्द्र शासित प्रदेश में बँट गया। उनका जम्मू-कश्मीर जब भी फिर से पूर्ण राज्य बनेगा तब क्या पूर्व प्रथा की तरह उसमें लद्दाख-कारगिल मौजूद होंगे? कतई नहीं। ये क़ुदरत का दस्तूर है कि कोई चूजे को वापस अंडे में नहीं डाल सकता। कोई दही को पलटकर दूध नहीं बना सकता। इसीलिए ज़मीनी हक़ीक़त के मुताबिक़ ही सियासत होनी चाहिए।
सहयोगी दलों की भी मूर्खता
पूरे प्रसंग में पहली मूर्खता नेशनल काँन्फ्रेंस के उन नेताओं की है जिन्होंने ‘दरबार मूव प्रथा’ को अपना चुनावी वादा बनाया। दूसरी मूर्खता काँग्रेस और सीपीएम जैसे उन सहयोगी दलों की है जिन्होंने इस वादे को ‘कॉमन मिनिमम प्रोग्राम’ बनाकर दरकिनार नहीं किया। तीसरी मूर्खता उस उमर अब्दुल्ला कैबिनेट ने की जिसने ‘दरबार मूव प्रथा’ के प्रस्ताव को मंज़ूरी दी।
चौथी मूर्खता, उपराज्यपाल मनोज सिन्हा ने की जिन्होंने अपनी ही केन्द्र सरकार के प्रगतिशील फ़ैसले को पटलने की मंज़ूरी दे दी। अरे, कम से कम राष्ट्रपति के पास ही मामला भेज देते। सबसे आश्चर्यजनक है– कड़े फ़ैसले लाने वाली मोदी-शाह की ख़ामोशी। कोई उनके ‘सही फ़ैसले’ को पटलने लगे और वो गुर्राए तक नहीं। तमाशबीन बने रहे।
हाईकोर्ट क्यों रहा ख़ामोश?
‘दरबार मूव प्रथा’ की बहाली जनादेश के बेज़ा इस्तेमाल की वैसी ही मिसाल है जैसे देश ने नोटबन्दी और मनमानी-भरा जीएसटी के रूप में झेली है। अब 31 अक्टूबर तक सरकार श्रीनगर से चलेगी और 3 नवम्बर से जम्मू से। न्यायपालिका जब-तब सरकारों को जवाबदेही के नाम पर कटघरे में खड़ा करती रही हैं। 2020 में एक जनहित के फ़ैसले में जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट ‘दरबार मूव प्रथा’ को धन-श्रम की बर्बादी, अनावश्यक और अनुपयोगी ठहरा चुका है तो फिर अभी हाईकोर्ट ने उमर अब्दुल्ला सरकार के फ़ैसले को अवमानना या Contempt की तरह क्यों नहीं देखा?
ये अन्धेरगर्दी नहीं तो फिर क्या है! हम्माम में सारे नंगे हैं – क्या राज्य सरकार, क्या विपक्ष, क्या केन्द्र सरकार, क्या न्यायपालिका! जनता को लूटने में सबकी मिलीभगत है! यदि मान भी लें कि ‘दरबार मूव प्रथा’ की बहाली से जम्मू के व्यापारी ख़ुश हैं तो क्या सरकार उन्हें इससे ज़्यादा टिकाऊ ख़ुशी उन्हीं रुपयों से जम्मू में ऐसे उद्योग-धन्धे स्थापित नहीं करके नहीं दे सकती थी? आख़िर सरकारें तमाम पीएसयू चलाती ही हैं ना। ऐसे ही किसी कम्पनी को जम्मू की वो सम्पत्तियाँ थमा दी जातीं जहाँ दरबार और उसका ताम-झाम उजड़ता तथा आबाद होता है।
अँग्रेज़ वायसराय भी अपना ‘दरबार’ गर्मियों में दिल्ली से शिमला ले जाते थे तो उस प्रथा को भी बहाल कीजिए। सती-प्रथा, बाल विवाह, बहुपत्नीवाद, छुआछूत जैसी तमाम कलंकित प्रथाएँ भी तो भारतीय समाज में रही हैं। उन्हें भी बहाल कर दीजिए। चलिए, भारत को हज़ारों साल पीछे ही लेकर चलें। यदि ये बातें मौजूदा दौर के हिसाब से कुतर्क हैं तो फिर ‘दरबार मूव प्रथा’ क्या है? मूर्खता का सिलसिला थमना चाहिए। ख़त्म होना चाहिए।
(मुकेश कुमार सिंह वरिष्ठ पत्रकार हैं।)